बस गठरी न दूंगी
मेरे जीवन पर कथा कहानियो का बहुत अधिक प्रभाव पड़ा है. इन कहानियो ने मुझे सदेव प्रेरित किया. जहाँ जीवन ज्ञान से परिपूरण हो उठा, वही जीवन के प्रति एक नवीन सोच का संचार भी हुआ. कथा - कहानिया जितनी ज्ञान्वर्दक होती है उतना ही उसमे जीवन के लक्ष्यों का भाव निहित होता है. यहाँ आज ऐसी ही एक कथा को कहता हु. याद न है किसने सुनाई थी मगर आज भी एक प्रेरणा स्थापित करती है.
एक बुढ़िया जंगल के रास्ते चली जाती थी. बियाबान जंगल में दूर - दूर तक कोई न दिखाई पड़ता था. भरी दोपहरी में सोचती थी कि कोई राहगीर मिल जाए तो सिर पर रखी सामान की गठरी उसको दे दूँ .जंगल पार बसे गाँव में भाई को दे देगा. मगर कोई न आता था. थकी हारी बुढ़िया पल भर को भी न रूकती थी. मील भर ही चली थी की इतने में पीछे से घोड़े की टापों की आवाज सुनाई पड़ी. बुढ़िया ने पलटकर देखा तो क्या देखती है की पीछे से एक घुड़सवार घोडा दुडाये चला आता है.
घुड़सवार निकट आया तो बुढ़िया ने रोका -" ऐ घोड़े वाले -ऐ घोड़े वाले."
घुड़सवार रुक गया. बुढ़िया की तरफ देखा तो पसीने से तरबतर थी, बोला-" क्या बात है माई, क्यों चीखती है."
बुढ़िया ने आशा भरी किरण से घुड़सवार की तरफ देखा फिर याचिका भरे स्वर में बोली-" अरे बेटा, जंगल पार करते ही मेरे भाई का पहला घर है. गठरी लेकर चला न जाता है. यह गठरी ले जाओ. भाई के यहाँ रख देना. आपका उपकार होगा बेटा."
" नहीं माई -नहीं, मुझे बड़ी जल्दी है." कहकर घुड़सवार ने घोडा दौड़ा दिया.
बुढ़िया निरीह सी होकर देखती रह गई.
अभी घुड़सवार कुछ ही कदम गया था कि उसका मन पलटा. उसने सोचा कि पता नहीं गठरी में क्या है फिर बुढ़िया भी उसे जानती नहीं. क्यों न बुढ़िया की गठरी लेकर भाग जाऊं. यह विचारकर उसने घोडा वापस घुमाया और आ गया बुढ़िया के पास, बोला -" ला माई दे अपनी गठरी. छोड़ दूंगा तुम्हारे भाई के घर." चलते -चलते बुढ़िया बोली-" नहीं बेटा अब गठरी न दूंगी.जिसने तुम्हे गठरी लेने भेजा है उसी ने मुझे कहा है कि बुढ़िया अब इसे गठरी न देना. जाओ बेटा -जाओ बेटा जाओ."
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